RBI की रेपो रेट और आपका लोन
रेपो रेट वह दर है जिस पर भारतीय रिज़र्व बैंक बैंकों को उधार देता है। अक्टूबर 2019 से नए फ़्लोटिंग रेट होम लोन, और कई वाहन व बिज़नेस लोन, एक बाहरी बेंचमार्क से जुड़े हैं, आम तौर पर रेपो रेट से। आपकी दर रेपो रेट और बैंक के तय मार्जिन (स्प्रेड) का जोड़ है, इसलिए RBI के रेपो रेट बदलने पर यह भी बदलती है। RBI की मौद्रिक नीति समिति साल में छह बार दर की समीक्षा करती है।
EMI कैसे निकाली जाती है
भारत में बैंक घटते बैलेंस का तरीक़ा अपनाते हैं। हर महीने आपकी EMI का एक हिस्सा बाक़ी लोन पर ब्याज चुकाता है, और बाक़ी हिस्सा मूलधन घटाता है। फ़ॉर्मूला है:
EMI = P × r × (1 + r)n ÷ ((1 + r)n − 1)
यहाँ P लोन की रक़म है, r मासिक ब्याज दर (सालाना दर ÷ 12 ÷ 100) और n मासिक किस्तों की संख्या।
उदाहरण
8.5% पर 20 साल के ₹25 लाख के होम लोन की EMI लगभग ₹21,696 होती है। 240 महीनों में आप लगभग ₹52 लाख चुकाते हैं, यानी सिर्फ़ ब्याज लगभग ₹27 लाख, जो लोन की रक़म से भी ज़्यादा है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
क्या लंबी अवधि से मेरी EMI कम होती है?
हाँ, लेकिन कुल मिलाकर आप काफ़ी ज़्यादा ब्याज देते हैं। चुनने से पहले 15 और 20 साल के कुल ब्याज की तुलना करें।
क्या आंशिक प्रीपेमेंट से फ़ायदा होता है?
हाँ। प्रीपेमेंट की रक़म सीधे मूलधन घटाती है, जिससे बाद की हर किस्त का ब्याज कम होता है। ज़्यादातर बैंक व्यक्तियों के फ़्लोटिंग रेट होम लोन पर प्रीपेमेंट पेनल्टी नहीं लेते।
क्या प्रोसेसिंग फ़ीस शामिल है?
नहीं। यह कैलकुलेटर सिर्फ़ लोन की रक़म पर EMI दिखाता है। बैंकों की तुलना करते समय प्रोसेसिंग फ़ीस और बीमा अलग से जोड़ें।
RBI की रेपो रेट मेरी EMI पर कैसे असर डालती है?
ज़्यादातर नए फ़्लोटिंग रेट होम लोन रेपो रेट से जुड़े हैं। जब RBI इसे बढ़ाता है, तो बैंक इन लोन की दरें उतनी ही बढ़ा देते हैं, आम तौर पर तीन महीने के भीतर, और आपकी EMI या अवधि बढ़ जाती है। 8.5% पर 20 साल के ₹25 लाख के लोन पर 0.25% की बढ़ोतरी से हर महीने लगभग ₹400 जुड़ जाते हैं।
अनुमानित दरें कैसे निकाली जाती हैं?
हर दायरा मौजूदा रेपो रेट और उस प्रोडक्ट पर बैंकों के आम मार्जिन का जोड़ है। आपकी दर बैंक, आपके क्रेडिट स्कोर और आमदनी के हिसाब से ज़्यादा या कम हो सकती है।
स्रोत
- भारतीय रिज़र्व बैंक ↗ – नीतिगत रेपो रेट