तुलना कैसे होती है
ख़रीदना: आप डाउन पेमेंट और स्टांप ड्यूटी देते हैं, फिर EMI और रख-रखाव। आपकी संपत्ति घर की क़ीमत में से बाक़ी लोन घटाकर है।किराया: आप डाउन पेमेंट और स्टांप ड्यूटी की जगह उनका निवेश करते हैं, किराया देते हैं, और हर महीने EMI और रख-रखाव के मुक़ाबले किराए के बाद जो बचता है उसका निवेश करते हैं। आपकी संपत्ति वही निवेश है।होम लोन के ब्याज और मूलधन पर टैक्स छूट शामिल नहीं है, न ही कैपिटल गेन टैक्स और घर बदलने का ख़र्च। नतीजा इस पर बहुत निर्भर करता है कि क़ीमतें और किराए कितनी तेज़ी से बढ़ते हैं, इसलिए कुछ अलग आँकड़े डालकर देखें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
आम तौर पर फ़ैसला किस बात से होता है?
किराए और क़ीमत के अनुपात से। जब साल का किराया घर की क़ीमत के 3% से कम हो, जैसा ज़्यादातर भारतीय शहरों में है, तो 10–15 साल में किराए पर रहकर निवेश करना अक्सर आगे रहता है; ख़रीदना तब जीतता है जब क़ीमतें तेज़ी से बढ़ें या आप बहुत लंबे समय तक रहें।